Poem
हताशा से एक व्यक्ति
A poem by Vinod Kumar Shukla on despair and the quiet grace of walking together.
हताशा
से
एक
व्यक्ति
बैठ गया था
व्यक्ति को मैं नहीं जानता था
हताशा को जानता था
व्यक्ति को मैं नहीं जानता था
हताशा को जानता था
इसलिए
मैं
उस व्यक्ति के पास
गया
मैंने हाथ बढ़ाया
मेरा हाथ पकड़कर वह खड़ा हुआ
मुझे वह नहीं जानता था
मेरे हाथ बढ़ाने को जानता था
मैंने हाथ बढ़ाया
मेरा हाथ पकड़कर वह खड़ा हुआ
मुझे वह नहीं जानता था
मेरे हाथ बढ़ाने को जानता था
हम
दोनों
साथ
चले
दोनों एक दूसरे को नहीं जानते थे
साथ चलने को जानते थे
दोनों एक दूसरे को नहीं जानते थे
साथ चलने को जानते थे
— Vinod Kumar Shukla